हालांकि ट्रंप ने भी माना है कि युद्ध के कारण बढ़ी कीमतों ने इसमें एक अहम भूमिका निभाई है। ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बागेर घालीबाफ ने अमेरिका के साथ बातचीत का नेतृत्व किया है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया खाते पर लिखा कि ‘अगर अमेरिकी सरकार अंतरराष्ट्रीय आकाओं और भयादोहन करने वालों को खुश करने के लिए अपनी जनता की इच्छा के साथ धोखा करती है, तो उसे पता चल जाएगा कि उनके ‘नहीं’ के साथ एक भयानक दुस्वप्न भी जुड़ा है।’
ठीक से आकलन किया जाए तो मध्यावधि मतदान के तीन ऐसे प्रमुख बिंदु थे, जो रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवारों की पराजय का कारण बने। पहला, ईरान के साथ युद्ध की स्थिति। दूसरा, विदेशी सामानों पर लगाए गए आयात शुल्क और तीसरा, रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचे डीजल व ईंधन के दाम। इससे अमेरिका में महंगाई बढ़ी और आम आदमी का घर चलना दुश्वार हो गया।
अमेरिका में मध्यावधि चुनावों के बाद भारत में भी तीन बातों की चिंता है। पहला, अमेरिका भारत के ऊर्जा आयात पर अब क्या रुख अपनाता है, दूसरा, भारत-अमेरिका व्यापार समझौता और तीसरा वीजा। मध्यावधि चुनाव में हार के बावजूद अगर ट्रंप प्रशासन एच-1बी वीजा और आव्रजन नियमों को कड़ा करने के लिए एकतरफा कदम उठाता है, तो अमेरिकी संसद में डेमोक्रेटिक जनप्रतिनिधियों के विरोध के कारण उन्हें घरेलू स्तर पर अधिक रुकावटों का सामना करना पड़ सकता है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि अमेरिकी संसद (कांग्रेस) में डेमोक्रेटिक सदस्यों ने आव्रजन नियमों को अत्यधिक कड़ा करने वाले कदमों का पुरजोर विरोध किया है। उन्होंने प्रवासियों को वापस भेजे जाने का भी विरोध किया था। ट्रंप का एकतरफा नारा था, ‘भगाओ इन्हें… न अपील, न दलील, न वकील।’
अमेरिका में ट्रंप के इस ‘महा-अभियान’ के निशाने पर मुख्य रूप से अठारह हजार भारतीय थे। भारतीय विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका से 2025 और जुलाई 2026 तक कुल 4,840 भारतीय नागरिकों को वापस भेजा गया। जुलाई 2026 से नवंबर 2026 तक की अवधि के लिए अमेरिका से वापस भेजे गए भारतीयों की कुल संख्या का आधिकारिक सरकारी आंकड़ा अभी तक भारतीय विदेश मंत्रालय द्वारा जारी नहीं किया गया है। इसलिए कह नहीं सकते कि ट्रंप की मनमानी नीतियों के शिकार कितने भारतीय अप्रवासी हुए।
यह माना जा रहा है कि अमेरिका की ऊर्जा और शुल्क नीतियों में ट्रंप की मनमानी अब नहीं चलेगी। कांग्रेस में डेमोक्रेट जनप्रतिनिधियों के आने से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एकतरफा शुल्क और व्यापारिक नीतियों पर संसदीय निगरानी बढ़ेगी, जिससे ऊर्जा और व्यापार से जुड़े फैसलों पर राजनीतिक बहस और समीक्षा तेज होगी।
ऐसा समझा जाता है, इस समूचे संदर्भ में भारत ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ वाली नीतियों पर चलता रहेगा। आने वाले समय में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात के अवसर निकल सकते हैं, जैसे इस महीने मनीला में होने वाला ईस्ट-एशिया सम्मेलन और दिसंबर में मियामी में होने वाला जी20 सम्मेलन। उन मुलाकातों का इंतजार किया जा सकता है।
मध्य-पूर्व की कूटनीति से थोड़ा बाहर यूक्रेन का रुख किया जाए, तो वहां भी कभी खुशी, कभी गम वाली स्थिति है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की के एक अधिकारी सर्गी किस्लित्स्या ने यूक्रेनी टीवी पर वादा किया कि सत्ता में चाहे जो भी आए, यूक्रेन उनके साथ ‘सच्चे, सामान्य और स्थिर संबंध’ बनाए रखने की कोशिश करेगा। वे ‘पैट्रियट इंटरसेप्टर’ यानी मिसाइल रक्षा प्रणाली की मांग जारी रखेंगे। सच यह है कि ट्रंप ने जेलेंस्की को अपमानित किया और कभी-कभी फिर से सुलह भी कर ली। यूक्रेन को अभी भी ट्रंप और अमेरिका से काफी उम्मीदें हैं, जैसे हथियार और पैसे मिलना। साथ ही यह भरोसा मिलना कि वे यूक्रेन के साथ खड़े हैं। मगर महीनों की तनातनी के बाद कीव समझ गया है कि वह पूरी तरह से वाशिंगटन पर निर्भर नहीं रह सकता।
दुनिया बड़ी विचित्र है। जिस पल अमेरिका में ‘ब्लू सुनामी’ के जरिए ट्रंप की पार्टी पराजित हो रही थी, कीव में अमेरिका की प्रथम महिला मेलानिया ट्रंप को यूक्रेन के सर्वोच्च राजकीय सम्मान से नवाजा जा रहा था। इस मौके पर जेलेंस्की ने जानकारी दी कि मेलानिया की बदौलत रूस के कब्जे वाले ओलेशकी शहर से सैकड़ों आम नागरिकों को सुरक्षित बाहर निकाला जा सका। यह सम्मान उन्हें ‘यूक्रेन के लिए मानवीय सहायता में उनके महत्त्वपूर्ण व्यक्तिगत योगदान’ के लिए दिया गया है। इसे कूटनीति का करिश्मा ही कहेंगे।
ट्रंप द्वारा सताए देशों और शासन प्रमुखों की सूची लंबी है। उनकी कहानियां भी दिलचस्प हैं। मगर सबसे मौजूं सवाल आम अमेरिकी का जीना दुश्वार करने वाली महंगाई है। बाजार में उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें रॉकेट और पंखों की तरह होती हैं। ये रॉकेट की तरह तेजी से ऊपर जाती हैं, लेकिन पंखों की तरह बहुत धीरे-धीरे नीचे आती हैं।