सुप्रीम कोर्ट में दल बदल को लेकर बुधवार को दो बड़े घटनाक्रम हुए हैं। एक और जहां सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने दल बदल को लेकर एक याचिका दाखिल की है। वहीं, अदालत ने शिवसेना यूबीटी को राहत और झटका एक साथ दे दिया है। एक ओर जहां अदालत उद्धव सेना की याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जता दी। वहीं, विलय के फैसले पर तत्काल रोक लगाने से इनकार कर दिया है।
सिब्बल की तरफ से दी गई याचिका में इस बात पर चिंता जताई गई है कि दल बदल कानून कमजोर हो रहा है। उन्होंने कहा, ‘इस देश में क्या हो रहा है? अगर ऐसा होना जारी रहा, तो 10वीं अनुसूची बेकार हो जाएगी…। एक और याचिका है जो दाखिल हुई है।’ उनकी याचिका में 10वीं अनुसूची की व्याख्या को चुनौती दी गई है, जिसके जरिए अलग होने वाले गुट विलय की मदद से दल बदल कानून से बच जाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट शिवसेना यूबीटी की याचिका पर सुनवाई करने के लिए तैयार हो गया है। जस्टिस एस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने याचिका पर नोटिस जारी करते हुए लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय और अन्य प्रतिवादियों से जवाब मांगा है। पीठ ने कहा, ‘नोटिस जारी किया जाए।’ तथा मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद के लिए सूचीबद्ध कर दी। मॉनसून सत्र से पहले लोकसभा अध्यक्ष ने 18 जुलाई को शिवसेना यूबीटी के छह सांसदों के शिंदे नीत शिवसेना में विलय को अनुमति दी थी।
शिवसेना यूबीटी ने लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष दलील दी थी कि उसके बागी सांसदों को अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए क्योंकि यह दल-बदल विरोधी कानून के दायरे में आता है। इन छह सांसदों के विलय के बाद लोकसभा में शिवसेना के सदस्यों की संख्या बढ़कर 13 हो गई है। शिवसेना यूबीटी के टिकट पर कुल नौ सांसद निर्वाचित हुए थे, जिनमें से छह शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो गए हैं।
इससे पहले ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस में भी बड़ी टूट हुई थी। पार्टी के 60 से ज्यादा विधायकों और 20 सांसदों ने अलग होने का फैसला किया था। इसके बाद इन सांसदों ने NCPI यानि नेशनल सिटिजन्स पार्टी में विलय करने का फैसला कर लिया था। इस गुट में पूर्व मुख्यमंत्री की करीबी मानी जाने वाली काकोली घोष दस्तीदार, सायोनी घोष और वरिष्ठ सदस्य सुदीप बंदोपाध्याय समेत कई बड़े नाम थे।

