यूपी विधानसभा चुनाव 2027: कांग्रेस क्यों सीट शेयरिंग को लेकर सपा से जल्द बात करने पर दे रही जोर, क्या मानेंगे अखिलेश यादव?
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में अभी कुछ महीने बाकी हैं, लेकिन कांग्रेस प्रदेश में अपने सहयोगी राजनीतिक दल समाजवादी पार्टी (एसपी) के साथ सीट शेयरिंग पर बातचीत जल्द शुरू करने पर जोर दे रही है। इसे लेकर कांग्रेस ने दलील दी है कि गठबंधन का आधार सीटों की संख्या के बजाय जीतने लायक सीटें होनी चाहिए, न कि यह कि कौन सी पार्टी कितनी सीटों पर चुनाव लड़ती है।
दोनों दल अपनी चुनावी जीत का आकलन करने के लिए सभी विधानसभा क्षेत्रों का अलग-अलग सर्वे कर रही है। कांग्रेस नेताओं का मानना है कि इस कवायद का उद्देश्य ऐसी सीटों को पहचानना है जहां पार्टी की संगठनात्मक मौजूदगी और सपा के सपोर्ट बेस व वोट शेयर के मेल से गठबंधन को मजबूत किया जा सके।
क्यों जल्द बात करना चाह रही कांग्रेस?
बातचीत जल्द शुरू करने की यह कोशिश 2017 के विधानसभा चुनावों के कांग्रेस के आकलन पर है, जिसमें दोनों दल ने गठबंधन को किया था, लेकिन वे उस समझ को विधानसभा क्षेत्र के स्तर पर प्रभावी तालमेल में बदल नहीं सके थे।
कांग्रेस के एक नेता ने कहा, “पिछले चुनावों में देर से हुई बातचीत और चुनाव क्षेत्र के स्तर पर सही तालमेल न होने के कारण, गठबंधन का असर जमीनी स्तर पर नहीं दिख सका।” कांग्रेस नेता के मुताबिक, वे संसद सत्र के दौरान राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्री के साथ पार्टी के यूपी के सांसदों की हालिया बैठक में शामिल हुए थे।
सूत्रों के अनुसार, यह बैठक सपा प्रमुख अखिलेश यादव की दिल्ली में गांधी और प्रियंका से मुलाकात के बाद हुई थी।
बैठक में कांग्रेस सांसदों से आगे की रणनीति पर उनकी राय मांगी गई। नेताओं के मुताबिक, मौजूद सांसदों की आम राय यही थी कि बातचीत जल्द शुरू होनी चाहिए और सीटों का बंटवारा किसी संख्यात्मक फॉर्मूले के आधार पर नहीं, बल्कि इस आधार पर होना चाहिए कि किस विधानसभा क्षेत्रों में गठबंधन की जीत की संभावना सबसे अधिक है।
पार्टी के एक नेता ने कहा, “हम एक बात को लेकर साफ हैं कि हम चाहते हैं कि मुख्यमंत्री हमारे पार्टी का बने, लेकिन यह सपा पर निर्भर करता है। हम राज्य में अपनी मौजूदगी बढ़ाना चाहते हैं। इसके लिए ‘क्वालिटी’ सीटों पर चुनाव लड़ना जरूरी है।”
प्रदेश में संगठन को करना चाहती है मजबूत
यह तरीका प्रदेश में कांग्रेस के तुरंत के उस मकसद को दिखाता है जिसमें वह अधिक से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने के बजाय विधानसभा में अपनी मौजूदगी और संगठन को फिर से मजबूत करने पर जोर देना चाह रही।
अभी विधानसभा में कांग्रेस की मौजूदगी कम है और नेताओं का भी कहना है कि कोई सीट सिर्फ इसलिए पार्टी का गढ़ नहीं बन जानी चाहिए क्योंकि उसने वहां बार-बार चुनाव लड़ा है।
कांग्रेस के एक सांसद ने कहा, “अगर कोई पार्टी लगातार तीन बार कोई सीट हार रही है, तो उसे वह सीट देने से गठबंधन को कोई फायदा नहीं होता। अगर दूसरी पार्टी का उम्मीदवार अपने वोट और गठबंधन सहयोगी के वोट, दोनों को एक साथ ला सकता है, तो यह अधिक मजबूत स्थिति होती है।”
दोनों पार्टियों की ओर से किए जा रहे सर्वे में पिछले चुनावों के नतीजों, जातिगत समीकरणों, संगठन की मजबूती, उम्मीदवार की क्षमता और इस बात की जांच की उम्मीद है कि दोनों पार्टियों के वोट एक-दूसरे को किस हद तक ट्रांसफर हो सकते हैं।
