बसपा में उत्तराधिकारी की छटपटाहट, लेकिन ‘माया’ को अपनी ‘छाया’ पर ही ज्यादा भरोसा
बसपा सुप्रीमो मायावती परिवार में मची उथलपुथल को शांत करने के लिए एक के बाद एक जो दांव चल रही हैं, उनमें पार्टी में दबदबा बनाए रखने की ललक साफ झलकती है। बसपा संस्थापक कांशीराम के बाद पार्टी की सिरमौर बनीं मायावती 23 बरस की लंबी यात्रा के बाद अब उम्र के उस पड़ाव पर हैं, जहां राजनीतिक उत्तराधिकारी का सवाल और छटपटाहट दोनों उनके सामने मुंह बाये खड़े हैं। बड़े भतीजे आकाश आनंद को तीन बार हटाना फिर पार्टी से बाहर करने के बाद छोटे भतीजे ईशान को आगे करना बसपा सुप्रीमो की छटपटाहट का ही प्रमाण है। विरासत को सुरक्षित और भरोसेमंद हाथों में सौंपने की मायावती की तलाश फिलहाल जारी है।
विधानसभा चुनाव से पहले बसपा के भीतर चल रही पारिवारिक सोशल इंजीनियरिंग के भी कई मायने हैं। मायावती ने जिस तरह आकाश के ससुर अशोक सिद्धार्थ को राजनीतिक सन्यास के लिए मजबूर किया और फिर बिना वक्त गंवाए आकाश को चौथी बार पूरी तरह ‘पैदल’ कर दिया, उसके पीछे गहरी बिसात को भी नकारा नहीं जा सकता। एक भतीजे को ससुर समेत बाहर कर दूसरे को पार्टी की अगली कतार में लाकर खड़ा करने के फैसले का भविष्य भी आने वाले चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है।
मायावती ने अपने राजनीतिक सफर में जिस तरह अब तक उनके भरोसेमंद माने जाने वाले कई कद्दावरों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया है, उससे यह भी साफ है कि दूसरी पंक्ति के लिए दरवाजे बंद रहे हैं। बसपा के कद्दावर नेता गया चरण दिनकर, आरके चौधरी, स्वर्गीय डा.सोने लाल पटेल, लालजी वर्मा, रामअचल राजभर, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, बाबू सिंह कुशवाहा, इंद्रजीत सरोज, स्वामी प्रसाद मौर्य समेत ऐसे और कई नाम हैं, जो कभी मायावती के बेहद नजदीकी रहे और वक्त के साथ एक-एक कर सबकी छुट्टी भी होती गई।
अब बड़ा सवाल यह भी है कि ईशान उम्मीदों पर कितना खरे उतरेंगे। पार्टी की परंपरा के अनुरूप पदाधिकारी तो उन्हें स्वीकार लेंगे पर वह मिशन जेन-जी का चेहरा बन पाएंगे या नहीं क्योंकि दलित-पिछड़ों में युवा चेहरों को लेकर दूसरे दल भी चुनावी दंगल शुरू होते ही अपने-अपने दांव चलेंगे।
