चंपत राय की छाया से मुक्त नहीं हो पाया राम मंदिर ट्रस्ट, बदलाव में रणनीति की छाप दिख रही
श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के लिए हलछठ की तिथि यादगार बन गई। इस दिन ट्रस्ट की संरचना और जिम्मेदारियों में बड़ा बदलाव हुआ। कयासों के विपरीत पूर्व महासचिव चंपत राय की वापसी नहीं हुई, लेकिन नए ट्रस्टियों के चयन और पदाधिकारियों के दायित्वों में बदलाव में उनकी संगठनात्मक रणनीति की छाप जरूर दिखाई दी। राम मंदिर आंदोलन में विश्व हिंदू परिषद शुरू से प्रमुख भूमिका में रही है। इसी पृष्ठभूमि में ट्रस्ट के महासचिव के रूप में चंपत राय ने संघ परिवार के विभिन्न घटकों के बीच समन्वय बनाए रखने की कोशिश की।
चढ़ावा चोरी के प्रकरण के बाद चंपत राय को महासचिव पद से हटना पड़ा। हालांकि, ट्रस्ट से बाहर रहते हुए भी संगठन में उनकी भूमिका और प्रभाव को लेकर चर्चाएं बनी रहीं। नए ट्रस्टियों के चयन में अशोक सिंघल फाउंडेशन के संस्थापक ट्रस्टी महेश भागचंदका और राम मंदिर मुकदमे से जुड़े अधिवक्ता मदनमोहन पाण्डेय का नाम सामने आना इसी कड़ी से जोड़कर देखा जा रहा है।
दिल्ली के उद्योगपति महेश भागचंदका ने अशोक सिंघल फाउंडेशन की स्थापना की थी। चंपत राय भी इसके आजीवन ट्रस्टी हैं। रामलला की प्राण प्रतिष्ठा समेत मंदिर से जुड़े बड़े आयोजनों में भागचंदका की सक्रियता रही है। इसी तरह मदनमोहन पाण्डेय राम मंदिर मुकदमे में अधिवक्ता रहे हैं और पूर्व में प्रदेश के अपर महाधिवक्ता भी रह चुके हैं। दोनों को चंपत राय का करीबी माना जाता है। पदाधिकारियों के दायित्वों में बदलाव भी महत्वपूर्ण है। कोषाध्यक्ष रहे महंत गोविंद देव गिरि को महासचिव की केंद्रीय जिम्मेदारी देकर ट्रस्ट ने साधु समाज को महत्वपूर्ण संदेश दिया है। इससे अध्यक्ष और महासचिव दोनों प्रमुख पद संत समाज के शीर्ष प्रतिनिधियों के पास आ गए हैं। वहीं महेश भागचंदका को कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी देकर वित्तीय प्रबंधन में भी एक नया चेहरा सामने आया है।
रिक्त ट्रस्टी पद पर डा. निर्मला यादव की नियुक्ति भी कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। निधि समर्पण अभियान में उनकी सक्रिय भूमिका रही है और वह विहिप की दुर्गा वाहिनी से भी जुड़ी रही हैं। उनके चयन से महिला और पिछड़ा वर्ग, दोनों की भागीदारी का संदेश गया है। डा. अनिल मिश्र स्वयंसेवक की भूमिका में ही ट्रस्टी बने थे और उसी भूमिका में विदा हुए। वहीं विहिप के संयुक्त मंत्री गोपाल राव की सांगठनिक भूमिका पहले से तय मानी जा रही थी। हालांकि चढ़ावा चोरी प्रकरण के बाद पैदा हुए विवादों ने राम मंदिर में उनकी संभावित भूमिका के विस्तार पर विराम जरूर लगा दिया।
