November 2, 2026

बिहार वाला फॉर्मूला यूपी में आजमाएगी BJP? योगी-अमित शाह के निशाने पर सपा, अखिलेश-मुलायम के शासन को बना रही चुनावी मुद्दा

कानपुर के बिठूर में पिछले हफ्ते एक रैली के दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने करीब 45 मिनट तक भाषण दिया। उनके भाषण में 5 से 10 मिनट को छोड़ दें तो ज्यादातर समय पिछली अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी (सपा) सरकार पर निशाना साधने में बीता। योगी आदित्यनाथ ने सपा सरकार पर मुस्लिम तुष्टिकरण, बार-बार होने वाले सांप्रदायिक दंगों, खराब कानून-व्यवस्था और हिंदू सांस्कृतिक विरासत की अनदेखी करने के आरोप लगाए। इसके मुकाबले उन्होंने अपनी सरकार के कार्यकाल में मंदिरों के निर्माण और हिंदू धार्मिक स्थलों के विकास का जिक्र किया।

इस पूरे भाषण में से भाजपा की उत्तर प्रदेश इकाई ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक खास वीडियो क्लिप शेयर की। इसमें योगी आदित्यनाथ कहते हैं, ”सपा का मतलब दंगा है, सपा का मतलब भ्रष्टाचार है, सपा का मतलब परिवारवाद है। सपा का मतलब युवाओं के जीवन के साथ खिलवाड़ और प्रदेश में अराजकता है।”

इसके बाद उन्होंने लोगों से अपील की कि जब ये लोग नए रूप में उनके सामने आएं तो उन्हें पहचानें। योगी ने सपा नेताओं को भ्रष्टाचारी, माफिया के समर्थक और दंगाइयों का दोस्त बताया। उन्होंने कहा कि अब सपा के लोग भी भगवान राम का नाम जप रहे हैं। योगी ने लोगों से कहा, ”लेकिन याद रखना, आप बजरंगी हैं। कालनेमि को बजरंगी ने ही पहचाना था।”

इसके पांच दिन बाद लखनऊ में बीजेपी की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक हुई। इसके साथ ही पार्टी ने चुनावी तैयारियां तेज कर दीं। बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 1990 की मुलायम सिंह यादव सरकार के कार्यकाल का जिक्र किया। अमित शाह ने 30 अक्टूबर 1990 को अयोध्या में कारसेवकों पर हुई पुलिस फायरिंग को याद करते हुए अखिलेश यादव से सवाल किया, ”आप किस मुंह से सरकार बनाने की बात करते हैं?”

शाह ने कारसेवकों पर हुई फायरिंग की तुलना राम मंदिर निर्माण से की। उन्होंने कहा कि जनता सपा प्रमुख की तीसरी पीढ़ी तक को माफ नहीं करेगी।

योगी आदित्यनाथ सरकार के करीब 10 साल पूरे होने के बाद भाजपा का चुनावी अभियान एक अलग तस्वीर दिखा रहा है। पार्टी लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की तैयारी कर रही है और अपने कामकाज को चुनावी मुद्दा बना रही है। इसके बावजूद उसके राजनीतिक भाषणों का बड़ा हिस्सा मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव और 2017 से पहले उत्तर प्रदेश के हालात पर केंद्रित है।

भाजपा की यह रणनीति 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए के प्रचार अभियान से मिलती-जुलती है। उस समय नीतीश कुमार करीब 20 साल से सत्ता में थे और उनकी सरकार को सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ रहा था।

एनडीए ने उस चुनाव में नीतीश कुमार के कामकाज के साथ-साथ आरजेडी शासन के कथित ‘जंगलराज’ की भी याद दिलाई थी। यानी चुनाव प्रचार में मौजूदा सरकार की उपलब्धियों के साथ पिछली सरकार के कार्यकाल को भी बड़ा मुद्दा बनाया गया था।

उत्तर प्रदेश में बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं के भाषणों में ‘तब और अब’ यानी पिछली सरकार और मौजूदा सरकार के बीच तुलना बार-बार देखने को मिल रही है।

19 अक्टूबर को डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने कहा था कि सपा का ‘गुंडाराज और माफिया राज’ अब उत्तर प्रदेश में कभी वापस नहीं आएगा। इससे पहले इसी महीने डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने कहा था कि यूपी की जनता सपा के शासनकाल में कानून-व्यवस्था की खराब स्थिति और माफिया संस्कृति को नहीं भूली है।

योगी आदित्यनाथ भी इस संदेश को छोटे और आसानी से याद रहने वाले नारों के जरिए आगे बढ़ा रहे हैं। इस साल कई रैलियों में उन्होंने ‘देख सपाई, बिटिया घबराई’ नारे का इस्तेमाल करते हुए 2017 से पहले महिलाओं की सुरक्षा पर सवाल उठाए। उन्होंने पिछली सरकार के दौर को ‘एक जिला, एक माफिया’ बताया और इसकी तुलना अपनी सरकार की ‘एक जिला, एक उत्पाद’ योजना से की।

भाजपा के चुनावी प्रचार में भी यह तुलना साफ दिखाई दे रही है। पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई ने कई पोस्टर और प्रचार सामग्री जारी की है जिनमें सीधे तौर पर ‘सपा सरकार बनाम भाजपा सरकार’ दिखाया गया है।

एक पोस्टर में सपा सरकार के दौर के गैंगस्टर और नेता अतीक अहमद की तस्वीर दिखाई गई है। इसके मुकाबले योगी सरकार के दौरान उसकी बेनामी संपत्ति जब्त किए जाने का जिक्र किया गया है।

एक अन्य पोस्टर में पुरानी खबर के जरिए निवेशकों की कानून-व्यवस्था को लेकर चिंता दिखाई गई है। वहीं दूसरी तरफ मौजूदा समय में यूपी में पर्यटन बढ़ने का दावा किया गया है।

तीसरे पोस्टर में सपा सरकार के दौरान कब्रिस्तानों की बाउंड्री वॉल पर हुए खर्च की तुलना योगी सरकार की ओर से महानवमी पर सार्वजनिक अवकाश घोषित करने से की गई है। इसके लिए ‘तुष्टिकरण अपार’ और ‘आस्था का सत्कार’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है।

एक अन्य पोस्टर में 1990 की राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़ी हिंसा की तुलना 2026 में बनकर तैयार हुए राम मंदिर से की गई है। इस तरह भाजपा अपने प्रचार में पिछली सपा सरकार के कार्यकाल और मौजूदा सरकार के कामकाज के बीच अंतर दिखाने की कोशिश कर रही है।

भाजपा ने इस बात से इनकार किया है कि उसके पास जनता को बताने के लिए नई उपलब्धियां नहीं हैं और इसलिए वह बार-बार सपा सरकार के कार्यकाल का जिक्र कर रही है।

तक पहुंचा रही है। इसके साथ ही दोनों सरकारों के कामकाज की तुलना भी लोगों के सामने रख रही है ताकि वे सही फैसला कर सकें।

उन्होंने कहा, ”हम लोगों को बता रहे हैं कि 2017 से पहले उत्तर प्रदेश कैसा था और अब कितना बदल गया है। बिजली व्यवस्था, एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट और मेडिकल कॉलेज के क्षेत्र में साफ बदलाव दिखाई देता है। पहले दंगे होते थे लेकिन अब ऐसा नहीं है। हमारा मकसद लोगों को बताना है कि योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश की स्थिति और दिशा कैसे बदली है।”

वहीं समाजवादी पार्टी का कहना है कि बीजेपी बार-बार उसके शासनकाल का जिक्र इसलिए कर रही है क्योंकि उसके पास अपनी उपलब्धियों के आधार पर चुनाव लड़ने के लिए कुछ खास नहीं है।

सपा के राज्यसभा सांसद जावेद अली ने द इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि बीजेपी जिस पुराने इतिहास को बार-बार दोहरा रही है, उसका असर अब खत्म हो चुका है। उन्होंने दावा किया कि अखिलेश यादव की सरकार योगी सरकार से बेहतर थी और 2024 के चुनाव में जनता बीजेपी के इस प्रचार को खारिज कर चुकी है।

उन्होंने हाल ही में हुए एमएलसी चुनावों का भी जिक्र किया और कहा कि जनता बीजेपी के इस नैरेटिव को हराने के लिए तैयार है।

सपा प्रवक्ता फखरुल हसन ने कहा, ”हम अपनी सरकार के कामकाज और उपलब्धियों की बात करते हैं, जबकि बीजेपी हमारे बारे में बात करती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उसके पास दिखाने के लिए कोई काम नहीं है। उसका मकसद सिर्फ चुनाव को सांप्रदायिक बनाना है। बीजेपी की बैठक में कल भी ‘कटेंगे तो बटेंगे’ के नारे लगे। उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मुद्दों से कोई लेना-देना नहीं है।”

बीजेपी की यह चुनावी रणनीति बिहार में अपनाए गए प्रचार अभियान से मिलती-जुलती है। बिहार चुनाव से पहले एनडीए के सामने भी ऐसी ही स्थिति थी। नीतीश कुमार करीब दो दशक से सत्ता में थे। इसके बावजूद एनडीए के चुनाव प्रचार का बड़ा हिस्सा लालू प्रसाद यादव और 1990 के दशक से लेकर 2000 के शुरुआती वर्षों तक आरजेडी सरकार के कार्यकाल पर केंद्रित रहा।

फरवरी 2025 में भागलपुर में एक कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आरजेडी को बार-बार ‘जंगलराज वाले’ कहकर निशाना बनाया। वहीं नीतीश कुमार ने भी लोगों को उस दौर की याद दिलाई जब उनके मुताबिक अंधेरा होने के बाद लोग घरों से बाहर निकलने में डरते थे।

यह प्रचार लगातार जारी रहा। उस दौरान दो महीने में जेडीयू की ओर से जारी किए गए 12 चुनावी वीडियो में से 6 में ‘जंगलराज’ की याद दिलाई गई थी। इनमें एक वीडियो का नाम ‘भूले नहीं हैं बिहार के लोग’ था। एक अन्य वीडियो में ‘जंगलराज का चंपारण’ और ‘एनडीए का मतलब उन्नति और विकास’ की तुलना की गई थी।

इस प्रचार के जरिए मतदाताओं को संदेश दिया गया कि करीब 20 साल की सरकार से नाराजगी होने पर भी बदलाव का फैसला लेने से पहले पुराने शासनकाल को याद करना चाहिए।

उत्तर प्रदेश में बीजेपी सपा सरकार के कार्यकाल को कई मुद्दों के जरिए याद दिला रही है। यहां प्रचार सिर्फ अतीक अहमद या मुख्तार अंसारी जैसे माफिया नेताओं तक सीमित नहीं है।

बीजेपी अपने प्रचार में कब्रिस्तानों पर सरकारी खर्च, इफ्तार, सांप्रदायिक दंगे, अयोध्या में कारसेवकों पर गोलीबारी और हिंदू त्योहारों से जुड़े कथित प्रतिबंधों जैसे मुद्दों को भी उठा रही है।

इस तरह पार्टी 2017 से पहले के उत्तर प्रदेश की तस्वीर पेश करके मौजूदा सरकार के कामकाज से उसकी तुलना कर रही है। वहीं सपा इसे बीजेपी की अपनी उपलब्धियों से ध्यान हटाने की रणनीति बता रही है।

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