ईरान से तेल लेकर भारत आ रहे जहाज ने अचानक बदला रास्ता, चीन की तरफ क्यों मुड़ा?

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पश्चिम एशिया में युद्ध की वजह से मची हलचल के बीच ईरानी तेल लेकर भारत आ रहे जहाज ने रास्ता बदल लिया है। अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में आने वाला ईरानी कच्चे तेल से भरा यह टैंकर पहले भारत आने वाला था। हालांकि वह अब बीच रास्ते में अपना रुख बदलकर चीन की ओर बढ़ रहा है। अगर यह खेप भारत पहुंचती, तो 2019 के बाद पहली बार भारत द्वारा ईरानी कच्चे तेल की खरीद होती। गौरतलब है कि हाल ही में अमेरिकी प्रतिबंधों में ढील के बाद भारतीय रिफाइनर मौजूद ईरानी तेल की कुछ खेप खरीदने की संभावनाएं तलाश रहे हैं।

जहाज ट्रैकिंग कंपनी ‘केप्लर’ के मुताबिक ‘पिंग शुन’ नाम का अफ्रामैक्स टैंकर गुजरात के वाडिनार के बजाय अब अपना गंतव्य चीन के दोंगयिंग को बता रहा है। इस टैंकर को 2002 में बनाया गया था जिसे 2025 में अमेरिका ने प्रतिबंधित कर दिया था। हालांकि जहाज के ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (एआईएस) में दर्ज गंतव्य अंतिम हो, यह जरूरी नहीं है और यात्रा के दौरान इसमें बदलाव भी हो सकता है।

रिपोर्ट के मुताबिक रिफाइनिंग और मॉडलिंग विभाग के प्रमुख विश्लेषक सुमित रिटोलिया ने कहा, ”पिछले तीन दिन से वाडिनार (भारत) की ओर बढ़ रहा ईरानी कच्चे तेल का जहाज ‘पिंग शुन’ भारत को गंतव्य सूची से हटाकर अब चीन का संकेत दे रहा है।” रिटोलिया ने कहा कि जहाज के गंतव्य में बदलाव का कारण भुगतान से जुड़ी शर्तें हो सकती हैं। विक्रेता पहले दिए जाने वाले 30-60 दिन के ‘क्रेडिट’ से हटकर अब तुरंत या कम समय में भुगतान की मांग कर रहे हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि इस कच्चे तेल का वास्तविक खरीदार और विक्रेता कौन हैं। वाडिनार में रूसी तेल कंपनी रोसनेफ्ट समर्थित नायरा एनर्जी की दो करोड़ टन सालाना क्षमता वाली रिफाइनरी स्थित है।

रिटोलिया ने कहा कि ईरानी कच्चे तेल के साथ यात्रा के दौरान गंतव्य बदलना असामान्य नहीं है, लेकिन यह दिखाता है कि अब व्यापारिक शर्तें एवं वित्तीय जोखिम भी लॉजिस्टिक्स जितने ही महत्वपूर्ण हो गए हैं। उन्होंने कहा कि यदि भुगतान से जुड़े मुद्दे सुलझ जाते हैं, तो यह खेप अब भी किसी भारतीय रिफाइनरी तक पहुंच सकती है। भारत का तेल मंत्रालय पहले ही कह चुका है कि ईरानी तेल की खरीद फिर शुरू करने का फैसला तकनीकी और व्यावसायिक व्यवहार्यता पर निर्भर करेगा।

बता दें कि भारत ऐतिहासिक रूप से ईरानी कच्चे तेल का बड़ा खरीदार रहा है। रिफाइनरियों की अनुकूलता और बेहतर व्यावसायिक शर्तों के कारण भारत ‘ईरान लाइट’ और ‘ईरान हैवी’ श्रेणी का तेल बड़ी मात्रा में आयात करता था। 2018 में ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध कड़े होने के बाद मई 2019 से भारत ने ईरानी तेल आयात बंद कर दिया और इसकी जगह पश्चिम एशिया, अमेरिका तथा अन्य स्रोतों से तेल खरीदने लगा। उस समय भारत के कुल आयात में ईरानी तेल की हिस्सेदारी करीब 11.5 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। भारत ने 2018 में प्रतिदिन लगभग 5.18 लाख बैरल ईरानी तेल खरीदा था, जो जनवरी-मई 2019 के दौरान घटकर 2.68 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया। इसके बाद से कोई आयात नहीं हुआ।

अमेरिका ने पिछले महीने ईरानी तेल की समुद्र में मौजूद खेप की खरीद पर 30 दिन की अस्थायी छूट दी थी, जिसका उद्देश्य बढ़ती तेल कीमतों को नियंत्रित करना था। यह छूट 19 अप्रैल को समाप्त होगी। अनुमान है कि समुद्र में मौजूद जहाजों पर करीब 9.5 करोड़ बैरल ईरानी तेल है जिसमें से करीब 5.1 करोड़ बैरल तेल भारत को बेचा जा सकता है। वहीं बाकी चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया के खरीदारों के लिए अधिक उपयुक्त होगा। ‘पिंग शुन’ जहाज में करीब छह लाख बैरल तेल होने का अनुमान है जिसे चार मार्च के आसपास ईरान के खार्ग द्वीप से लादा गया था। इसका वाडिनार पहुंचने का अनुमानित समय चार अप्रैल बताया गया था।

युद्ध के बीच भुगतान व्यवस्था एक बड़ी चुनौती हालांकि बनी हुई है क्योंकि ईरान को वैश्विक बैंकिंग संदेश प्रणाली ‘स्विफ्ट’ से बाहर कर दिया गया है। भारत पहले ईरान से तेल की खरीद यूरो में तुर्किये के एक बैंक के माध्यम से करता था, लेकिन अब यह विकल्प उपलब्ध नहीं है। हालांकि ईरान को 2012 में यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों के बाद ‘स्विफ्ट’ से अलग कर दिया गया था। 2018 में अमेरिका द्वारा प्रतिबंध दोबारा लागू करने के बाद कई ईरानी बैंकों को फिर से इस प्रणाली से बाहर कर दिया गया जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार, तेल भुगतान और विदेशी मुद्रा भंडार तक उसकी पहुंच काफी सीमित हो गई।

 

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