ममता बनर्जी अपनी ही बनाई पार्टी से होंगी बेदखल, बागियों का TMC छीनने का प्लान

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पश्चिम बंगाल में एक दशक से ज्यादा समय तक राज कर चुकी तृणमूल कांग्रेस आज टूट की कगार पर है। खबर है कि बुधवार को विधायक ऋतब्रत बनर्जी को आधे से ज्यादा टीएमसी विधायकों ने समर्थन दे दिया है। खास बात है कि बनर्जी को टीएमसी ने निष्कासित कर दिया था। अगर इन आंकड़ों के आधार पर पार्टी में टूट होती है, तो ममता बनर्जी से टीएमसी का नाम और चिह्न दोनों ही छिन जाएगा।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बनर्जी औऱ विधायक संदीपन साहा बंगाल विधानसभा पहुंचे हैं। उनका दावा है कि 59 विधायक उन्हें समर्थन दे रहे हैं। सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा है कि विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को नए नेता प्रतिपक्ष के रूप में चुना है। खास बात है कि टीएमसी पहले ही शोभनदेव चट्टोपाध्याय के नाम को आगे बढ़ा चुकी है, जिसे लेकर हस्ताक्षर विवाद जारी है।

4 मई को जब पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित हुए, तो टीएमसी ने 80 सीटों पर जीत हासिल की थी। हालांकि, खुद ममता बनर्जी को भवानीपुर सीट से हार का सामना करना पड़ा था। अब जब ऋतब्रत की तरफ से 59 विधायकों के समर्थन का दावा किया जा रहा है, तो टीएमसी का टूटना लगभग तय है। अगर इतनी बड़ी संख्या में विधायक उन्हें समर्थन देते हैं, तो दल बदल कानून भी लागू नहीं होगा।

खास बात है कि अगर ऐसा होता है, तो कांग्रेस से अलग होकर टीएमसी बनाने वालीं ममता बनर्जी खुद ही अपनी पार्टी से हाथ धो बैठेंगी। ऐसे में उनसे टीएमसी का नाम और जोड़फूल चुनाव चिह्न भी छिन सकता है। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, सूत्रों का कहना है कि बागी गुट ने स्पीकर रतींद्रनाथ बोस को अपना समर्थन पत्र भी सौंप दिया है, जिसमें दावा किया गया है कि दो तिहाई यानी 54 से ज्यादा पार्टी विधायक उनके साथ हैं।

रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से यह भी बताया गया है कि नया दल बनाने की कोई योजना नहीं है। फिलहाल, विधानसभा में विधायकों की बैठक चल रही है। खास बात है कि ठीक ऐसा ही राजनीतिक घटनाक्रम साल 2022 में महाराष्ट्र में देखा गया था। उस दौरान एकनाथ शिंदे ने अधिकांश विधायकों के साथ मिलकर शिवसेना से अलग होने का फैसला कर लिया था।

1 जून को पार्टी के महासचिव अभिषेक बनर्जी ने पत्र लिखा था। उस पत्र में वरिष्ठ विधायक चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष, आशिमा पात्रा और नयना बंदोपाध्याय को उप नेता और फिरहाद हाकिम को चीफ व्हिप बनाया गया था। खबरें थीं कि पश्चिम बंगाल विधानसभा ने पत्र को यह कहकर खारिज कर दिया था कि नियुक्ति विधायकों के मतों के आधार पर होती है। साथ ही अभिषेक बनर्जी के साइन करने के अधिकार पर भी सवाल उठाए गए थे।

टीएमसी सांसद सागरिका घोष ने वरिष्ठ सांसद सौगत रॉय का एक बयान साझा किया है। इसमें कहा गया है, ‘पश्चिम बंगाल विधानसभा में लंबे समय से यह परंपरा रही है कि 2001, 2011, 2016 और 2021 की तरह नेता प्रतिपक्ष को संबंधित पार्टी की सिफारिश पर मान्यता दी जाती है। यह परंपरा और प्रक्रिया कई दशकों से लगातार अपनाई जाती रही है। इस वर्ष भी यही किया गया है। पार्टी की सिफारिश के बाद शोभनदेब चट्टोपाध्याय की नियुक्ति को माननीय अध्यक्ष द्वारा पहले ही स्वीकार किया जा चुका है। 15 मई को श्री शोभनदेब चट्टोपाध्याय ने नेता प्रतिपक्ष के आधिकारिक कार्य का निर्वहन करते हुए माननीय अध्यक्ष को उनकी कुर्सी तक पहुंचाया। इसलिए किसी तरह का कोई भ्रम नहीं है और शोभनदेब चट्टोपाध्याय ही नेता प्रतिपक्ष हैं।’

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने सोमवार को आरोप लगाया कि राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता के चयन को लेकर बड़े पैमाने पर विधायकों के हस्ताक्षरों का फर्जीवाड़ा किया गया है। उन्होंने कहा कि तृणमूल के राष्ट्रीय महासचिव ने नौ मई को विधानसभा अध्यक्ष बसु को पत्र लिखकर सूचित किया था कि शोभनदेव चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता और नयना बंद्योपाध्याय को उपनेता चुना गया है, जबकि, विधानसभा में विपक्ष के ‘उपनेता’ का कोई कानूनी प्रावधान ही नहीं है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि आखिरकार 27 मई को एक प्रस्ताव की कॉपी सौंपी गई। उन्होंने हालांकि आरोप लगाया कि इस प्रस्ताव में विधायकों के हस्ताक्षर पर गहरा संदेह हुआ। यह विवाद तब और बढ़ गया जब तृणमूल के दो विधायकों रितब्रत बंद्योपाध्याय और संदीपन साहा ने विधानसभा अध्यक्ष को लिखित शिकायत सौंपी। उन्होंने आरोप लगाया कि छह मई का जो प्रस्ताव नेतृत्व चयन प्रक्रिया के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया गया था, वह पूरी तरह फर्जी और नकली था। उनकी शिकायत के अनुसार, उस प्रस्ताव पर 14 विधायकों के फर्जी हस्ताक्षर किए गए थे।

 

 

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