पश्चिम बंगाल की राजनीति से उठा बगावत का तूफान अब दिल्ली की सत्ता के समीकरण पूरी तरह बदल चुका है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों ने एक ऐसी गुमनाम और अमान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी (NCPI) पर कब्जा कर लिया है, जिसका पिछली बैलेंस शीट में कुल बैंक बैलेंस मात्र 75 रुपये था। इस रातों-रात हुए राजनीतिक तख्तापलट ने न केवल ममता बनर्जी को एक बड़ा झटका दिया है, बल्कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के भीतर सत्ता का संतुलन भी पूरी तरह से पलट कर रख दिया है।
नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) का गठन जनवरी 2023 में हुआ था। चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार, इसका मुख्यालय पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के सांकराइल स्थित एक गैर-सरकारी संगठन (NGO) की इमारत में है। नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) के पास वित्तवर्ष 2022-23 में महज 75 रुपये बचे थे। यह जानकारी पार्टी की उस सालाना लेखापरीक्षण रिपोर्ट में आई थी, जिसे उसने 2022-23 के लिए निर्वाचन आयोग को सौंपा था।
एनसीपीआई ने बताया कि वित्त वर्ष 2022-23 के दौरान उसे ”समर्थकों से चंदे” के तौर पर 1,13,075 रुपये मिले। उसका खर्च भी लगभग इतना ही, यानी 1.13 लाख रुपये था, जिसमें 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनावों पर खर्च किए गए 49,400 रुपये भी शामिल थे। पार्टी कोष में दान देने वाले नौ लोगों में पार्टी के अध्यक्ष शेवली कुंडू और उपाध्यक्ष उत्तिया कुंडू शामिल थीं, जो पति-पत्नी हैं। उन्होंने क्रमशः 15,000 रुपये और 18,000 रुपये का योगदान दिया।
निर्वाचन आयोग के दस्तावेजों में एनसीपीआई को वित्त वर्ष 2023-24 एवं 2024-25 में मिले चंदे की कोई जानकारी नहीं है। पार्टी ने त्रिपुरा चुनावों में चार उम्मीदवार मैदान में उतारे और अपने चुनावी नारे ”राजनीतिक दल-बदलुओं को नकारें” के जरिए मतदाताओं से अपील की। इन चार में से दो उम्मीदवारों ने पार्टी के चुनाव चिह्न पर किस्मत आजमाई और तीसरे ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा, जबकि चौथे उम्मीदवार का नामांकन रद्द कर दिया गया
पार्टी के एक उम्मीदवार, बरजेडा त्रिपुरा को 536 वोट मिले, जो नोटा से 36 ज्यादा थे, जबकि दूसरे उम्मीदवार को 286 वोट मिले। निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने वाले को 376 वोट मिले। बरजेडा ने बताया कि वह दिहाड़ी मजदूर के तौर पर काम करते हैं और उन्हें पार्टी से जुड़ी हालिया राजनीतिक गतिविधियों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला अगर तृणमूल के बागी सांसदों के गुट को एनसीपीआई से विलय की मंजूरी दे देते हैं तो संसद के निचले सदन में वह छठी सबसे बड़ी पार्टी और सत्तारूढ़ भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन जाएगी। यह लोकसभा सांसदों के मामले में एनडीए के अंदर चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी (तेदेपा) और नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड (जदयू) से काफी आगे होगी। हालांकि, एनसीपीआई के पास इससे पहले स्थानीय निकायों में एक पार्षद तक नहीं था।
एनसीपीआई नेतृत्व का परिचय भी अनोखा है। पार्टी की संस्थापक अध्यक्ष शेवली कुंडू खुद को कलकत्ता उच्च न्यायालय की वकील बताती हैं। उनकी शैक्षणिक योग्यता में ”गणित में स्नातकोत्तर, एमबीए और एलएलएम” के साथ-साथ फाइनेंशियल मार्केट से लेकर जमीन की पैमाइश (लैंड सर्वेइंग) तक कई प्रमाण पत्र शामिल हैं। फिलहाल शेवली ने सोमवार को संवाददाताओं को बताया कि उन्होंने पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है।
वहीं, उत्तिया कुंडू खुद को ”बांग्ला अखबार के संपादक, गणित के शिक्षक, प्रेरक वक्ता, आईएसओ ऑडिटर, स्वास्थ्य परामर्शदाता और योग स्वयंसेवक” बताते हैं। उनकी बताई गई शैक्षणिक योग्यताओं में ”गणित में स्नातकोत्तर” के साथ-साथ योग प्रशिक्षण, पेशेवर पाठ्यक्रम और जमीन की पैमाइश (लैंड सर्वेइंग) से जुड़े कई डिप्लोमा शामिल हैं।
इस विलय का सबसे बड़ा रणनीतिक असर किंगमेकर की भूमिका निभा रहे चंद्रबाबू नायडू (TDP) और नीतीश कुमार (JDU) पर पड़ा है। अब तक ये दोनों दल NDA के भीतर क्रमशः दूसरे और तीसरे सबसे बड़े घटक दल थे और इनकी सीटों के दम पर गठबंधन का गणित टिका हुआ था।
NCPI के NDA में शामिल होने और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा विलय को सैद्धांतिक मंजूरी मिलने के बाद, लोकसभा में NDA का शक्ति-क्रम बदल गया है:
इस नए गणित ने नायडू और नीतीश की ‘बार्गेनिंग पावर’ यानी सौदा करने की शक्ति को काफी हद तक कम कर दिया है। सरकार अब अहम फैसलों या विधेयकों को पारित कराने के लिए पूरी तरह से केवल TDP या JDU पर निर्भर नहीं है, क्योंकि NCPI के 20 सांसदों का ब्लॉक अब एक मजबूत बफर के रूप में काम करेगा। सूत्रों के अनुसार, इसके बदले में सुदीप बंद्योपाध्याय और एक अन्य सांसद को आगामी कैबिनेट फेरबदल में मंत्री पद दिया जा सकता है।
TMC के बागियों ने दल-बदल विरोधी कानून से बचने के लिए इसी पार्टी को अपना कानूनी ‘एस्केप रूट’ बनाया। 10वीं अनुसूची के तहत सदस्यता बचाने के लिए 2/3 सांसदों (28 में से 20) का एक साथ टूटना और किसी पंजीकृत पार्टी में विलय करना अनिवार्य था। बागियों ने नई पार्टी बनाने के बजाय NCPI को चुना।
विलय की पटकथा पहले ही लिख दी गई थी। NCPI की संस्थापक अध्यक्ष शिउली कुंडू ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। 30 मई 2026 को TMC की दिग्गज नेता और चार बार की सांसद काकोली घोष दस्तीदार को NCPI की ‘पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी’ द्वारा नया राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया गया। अब यह पार्टी पूरी तरह से TMC के बागी गुट के नियंत्रण में है और सुदीप बंद्योपाध्याय (वरिष्ठ बागी सांसद) जैसे दिग्गज नेता इसमें शामिल हो चुके हैं।

