September 19, 2026

जज के साथ अन्याय हो तो वह कहां जाएं? फांसी की सजा का रिकॉर्ड बनाने वाले न्यायाधीश रवि दिवाकर का दर्द

यूपी के मुजफ्फरनगर में विशेष न्यायाधीश एनडीपीएस एक्ट/अपर सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने एक मामले पर फैसला सुनाते हुए सवाल किया कि यदि किसी न्यायाधीश के साथ अन्याय हो तो वह कहां जाए? साथ ही यह भी पूछा कि यदि सेशन जज या जिला जज का कोई प्रशासनिक आदेश कानून के दिशा-निर्देशों के खिलाफ और ‘विदाउट ज्यूरिस्डिक्शन’ हो तो क्या संबंधित अधिकारी उसे मानने के लिए कानूनन बाध्य है? रवि दिवाकर वही जज हैं जिन्होंने पिछले पांच महीने में ही 23 लोगों को फांसी की सजा सुनाई है। उनसे 100 से ज्यादा मामलों को छीन लिया गया है। रवि दिवाकर ने अपना दर्द गुरुवार को सुनाए गए एक फैसले के दौरान बयां किया।

रवि दिवाकर ने गुरुवार को सुनाए गए फैसले में अभियोजन साक्ष्यों का परीक्षण करने के साथ ही न्यायिक प्रशासन से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवाल भी उठाए। फैसले में न्यायिक प्रकरणों को एक अदालत से दूसरी अदालत में स्थानांतरित अथवा वापस लिए जाने में पारदर्शिता और उसके कारणों को रिकॉर्ड पर दर्ज करने की आवश्यकता पर विस्तार से चर्चा की गई है।

न्यायाधीश ने फैसले में 18 अगस्त 2026 के प्रशासनिक आदेश का उल्लेख करते हुए पार्ट-हर्ड मामलों की पत्रावलियों को वापस लिए जाने के मुद्दे पर सवाल उठाए हैं। फैसले में कहा गया कि यदि किसी गंभीर प्रकृति के मुकदमे की पत्रावली किसी विशेष न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है और उसे प्रशासनिक स्तर पर वापस लिया जाता है अथवा दूसरे न्यायालय में स्थानांतरित किया जाता है तो उसके पीछे के कारणों का रिकॉर्ड पर स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए। फैसले में यह भी दर्ज है कि संबंधित पत्रावलियों को तत्कालीन जिला एवं सत्र न्यायाधीश के आदेशानुसार रिकॉल किया गया, लेकिन उक्त आदेश में पत्रावलियों को वापस लेने का स्पष्ट कारण दर्ज नहीं था।

न्यायाधीश ने फैसले में विभिन्न न्यायिक निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि प्रशासनिक आदेश भी कारणयुक्त होना चाहिए। उनके अनुसार किसी आदेश में निकाले गए निष्कर्ष के समर्थन में कारण दर्ज करना आवश्यक है। फैसले में सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि कारण बताने में विफलता न्याय से इनकार के समान हो सकती है।

फैसले में यह भी कहा गया है कि किसी शक्ति का अस्तित्व अपने आप में उसके किसी भी तरीके से इस्तेमाल को उचित नहीं ठहराता। शक्ति के साथ जिम्मेदारी, विवेक, पारदर्शिता और जवाबदेही आवश्यक है।

न्यायाधीश दिवाकर ने फैसले में लोक सेवकों की भूमिका पर भी टिप्पणी की। उन्होंने लिखा कि एक लोक सेवक को सही को सही और गलत को गलत कहने की क्षमता होनी चाहिए। उनके अनुसार लोक सेवक जिस संस्था या सिस्टम का हिस्सा होता है, वह उस संस्था का प्रतिनिधित्व भी करता है। यदि व्यवस्था में सही और गलत के बीच अंतर करने की क्षमता समाप्त हो जाए तो संस्था लोगों का विश्वास खोने लगती है।

फैसले में ‘रूल ऑफ लॉ’ यानी विधि के शासन का उल्लेख करते हुए कहा गया कि कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है और लोक सेवक के आदेश में उसके कारण स्पष्ट होने चाहिए।

फैसले में कहा गया है कि न्यायिक प्रकरणों से संबंधित महत्वपूर्ण प्रशासनिक निर्णय अभिलेख पर यथासंभव स्पष्ट और सुविचारित रूप में दर्ज होने चाहिए। विशेषकर गंभीर मामलों की पत्रावलियां जब प्रशासनिक स्तर पर बिना कारण दर्ज किए वापस ली जाएं या दूसरे न्यायालय में स्थानांतरित हों तो निर्णय के पीछे के कारणों का उल्लेख रिकॉर्ड की पूर्णता और भविष्य में निर्णय की पृष्ठभूमि समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

अंत में न्यायाधीश ने यह प्रश्न भी दर्ज किया कि यदि सेशन जज अथवा जिला जज का कोई प्रशासनिक आदेश कानून के दिशा-निर्देशों के विरुद्ध हो और ‘विदाउट ज्यूरिस्डिक्शन’ हो, तो क्या संबंधित अधिकारी उसे मानने के लिए कानूनन बाध्य है।

नई मंडी थाना क्षेत्र में वर्ष 2015 में दर्ज चरस बरामदगी के मामले में अशोक भारती को दोषमुक्त करते समय जज ने दर्द बयां किया है। 21 अक्तूबर 2015 को नई मंडी पुलिस ने भरतिया कॉलोनी के मोड़ के पास अशोक भारती को पकड़ने का दावा किया था। पुलिस के अनुसार तलाशी में उसके कुर्ते की दाहिनी जेब से पॉलीथिन में करीब 150 ग्राम चरस बरामद हुई थी। इस मामले में मुकदमा अपराध संख्या 1005/2015, धारा 8/20 एनडीपीएस एक्ट के तहत दर्ज किया गया था।

मामले में अभियोजन की ओर से चार गवाह पेश किए गए। बरामदगी की फर्द, एफआईआर, गिरफ्तारी मेमो, आरोपपत्र और नक्शा नजरी समेत अन्य दस्तावेज साक्ष्य के रूप में पेश किए गए। अभियुक्त ने अदालत में बरामदगी को गलत बताते हुए मुकदमा रंजिशन चलाए जाने की बात कही थी।

फैसले में न्यायालय ने आपराधिक न्याय व्यवस्था के स्थापित सिद्धांत का उल्लेख किया कि अभियोजन पक्ष को आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को युक्तियुक्त संदेह से परे साबित करना होता है। अदालत ने उपलब्ध मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों का परीक्षण किया और इसके बाद अशोक भारती को दोषमुक्त कर दिया।

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