ताकतवर देशों के एक और एलीट क्लब में शामिल होगा भारत, US के साथ हुई बड़ी डील

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भारत और अमेरिका की कंपनियों ने जेट इंजन के संयुक्त निर्माण के लिए समझौता किया है। यह कदम नरेंद्र मोदी सरकार की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत वायुसेना के आधुनिकीकरण और देश में हथियारों के उत्पादन के लिए विदेशी साझेदार की तलाश की जा रही है। अमेरिका के ओहायो स्थित रक्षा निर्माता जीई एयरोस्पेस और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने कहा है कि एफ414 इंजनों के सह-उत्पादन के लिए तकनीकी मुद्दों पर सहमति बना ली गई है। करीब तीन वर्षों से चल रही बातचीत अब उत्पादन की दिशा में दोनों साझेदारों को एक कदम और करीब ले आई है।

दोनों कंपनियों ने एफ414 जेट इंजन के भारत में सह-उत्पादन के लिए तकनीकी शर्तों पर सहमति बना ली है। यह सिर्फ इंजन बनाने का करार नहीं है, बल्कि इसमें तकनीक का हस्तांतरण भी शामिल है।

यह कदम मेक इन इंडिया पहल के लिए एक अहम मोड़ साबित होगा। इसका उद्देश्य देश की पुरानी होती वायुसेना का आधुनिकीकरण और रूस पर दशकों पुरानी निर्भरता को कम करना है। भारत की योजना है कि इस इंजन का इस्तेमाल 120 से 130 अगली पीढ़ी के स्वदेशी विकसित लड़ाकू विमानों में किया जाए। भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो सकता है जो उच्च प्रदर्शन वाले जेट इंजन खुद बना सकते हैं।

अमेरिका आमतौर पर जेट इंजन तकनीक को साझा नहीं करता। लेकिन जो बाइडेन प्रशासन ने इस डील को 2023 में तेजी से आगे बढ़ाया। इसका मकसद इंडो-पैसिफिक में चीन के प्रभाव को संतुलित करना और भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी मजबूत करना है।

यह इंजन अमेरिकी नौसेना के लड़ाकू विमानों में दशकों से इस्तेमाल हो रहा है। इसे भरोसेमंद और युद्ध में परखा हुआ माना जाता है। भारत इसे अपने आने वाले स्वदेशी लड़ाकू विमानों (जैसे तेजस एमके2) में इस्तेमाल करेगा।

यह समझौता सिर्फ रक्षा सौदा नहीं बल्कि भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। रूस पर निर्भरता कम करने की रणनीति और वैश्विक रक्षा आपूर्ति शृंखला में भारत की एंट्री अब अगला कदम होगा। समझौते को अंतिम रूप मिलने पर तय होगा कि तकनीक का कितना हिस्सा भारत को मिलेगा और कब से भारत में इंजन बनना शुरू होगा।

 

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