यूपीआई पेमेंट को लेकर छिड़ी बहस, जानकार क्यों कह रहे अमेरिकी दबाव में बदला जा रहा क़ानून
यूपीआई नीति बदलने की आशंका के बीच भारत में डिज़िटल भुगतान व्यवस्था को लेकर बहस तेज़ हो गई है.
इसकी वजह है कि विपक्ष और आर्थिक मामलों के कई जानकार यूपीआई भुगतान पर शुल्क लगाए जाने की आशंका जता रहे हैं.
हालांकि स्पष्ट किया है कि यूपीआई उपभोक्ताओं के लिए फ़्री बना रहेगा, हालांकि यह भी कहा गया है कि चार्ज सिर्फ व्यवसायों पर लागू होगा.
पेमेंट्स काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने भी स्पष्टीकरण जारी किया है, जिसे पीएमओ (प्रधानमंत्री कार्यालय) ने पेमेंट्स काउंसिल के स्पष्टीकरण से जुड़ी ख़बर को अपने एक्स हैंडल से शेयर किया है.
शनिवार को पेमेंट्स ऐप फोनपे के फ़ाउंडर और सीईओ समीर निगम ने एक्स पर लिखा कि यूपीआई पेमेंट्स पर कंज्यूमर से कोई चार्ज नहीं लिया जाएगा.
उन्होंने लिखा कि ‘यूपीआई फ़्री है और भारत के सभी उपभोक्ताओं के लिए फ़्री रहेगा.’
इससे पहले वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गुरुवार को कहा था कि डिज़िटल ट्रांजैक्शन पर लगने वाला मर्चेंट डिस्काउंट रेट सिर्फ़ व्यापारियों पर लागू होता है, कस्टमर पर नहीं.
सीतारमण के इस बयान पर अर्थशास्त्री जयति घोष ने एक्स पर लिखा, ”इस बयान की आर्थिक मूर्खता को अलग भी रख दें, तो भी आख़िरकार इसकी लागत का बोझ उपभोक्ताओं पर ही पड़ेगा.”
उन्होंने लिखा, “यह भी ध्यान देने वाली बात है कि यूपीआई का इस्तेमाल करने वाले ज़्यादातर ‘मर्चेंट’ छोटे और माइक्रो बिज़नेसमैन हैं. यानी आम लोगों पर ज़्यादा लागत का बोझ डाला जाएगा, ताकि अमेरिकी वित्तीय कंपनियों को फ़ायदा पहुंचाया जा सके. और यह सब ट्रंप को खुश करने की एक और बेकार कोशिश में हो रहा है.”
इकोनॉमिक्स टाइम्स के मुताबिक़, व्यापार मामलों के थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनीशिएटिव (जीटीआरआई) ने कहा है कि “भारत को अमेरिका के दबाव में आकर यूपीआई और रुपे जैसी घरेलू भुगतान प्रणालियों की नीतियों में बदलाव नहीं करना चाहिए.”
जीटीआरआई के निदेशक अजय श्रीवास्तव ने एक लेख में लिखा, “अमेरिका ने भारत की शून्य-एमडीआर नीति, रुपे को बढ़ावा देने, यूपीआई से क्रेडिट कार्ड जोड़ने में रुपे को मिले शुरुआती लाभ, डेटा लोकलाइज़ेशन नियमों और यूपीआई ऐप्स के लिए एनपीसीआई की प्रस्तावित 30 प्रतिशत बाज़ार हिस्सेदारी सीमा पर आपत्ति जताई है.”
“इन नीतियों को अमेरिकी कंपनियों के लिए बाधा बताया जा रहा है. सरल शब्दों में कहें तो वीज़ा और मास्टरकार्ड शुल्क से होने वाली आय गंवा रहे हैं और चाहते हैं कि भारतीय सरकार उनकी मदद करे.”
दरअसल अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) की 2026 की रिपोर्ट में भारत के यूपीआई और रूपे भुगतान प्रणालियों की आलोचना की गई है. रिपोर्ट में ब्राज़ील की पिक्स भुगतान प्रणाली का भी ज़िक्र किया गया है.
लोकसभा में पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट संशोधन विधेयक छह अगस्त को पारित हुआ, जिसका विपक्षी दल विरोध कर रहे हैं.
ये विधेयक संसद के दोनों सदनों से पास होकर क़ानून बनने के बाद सरकार को बैंकों और पेमेंट सेवा प्रदाताओं को यूपीआई और अन्य डिज़िटल भुगतान माध्यमों पर ‘मर्चेंट डिस्काउंट रेट’ (एमडीआर) लगाने की अधिकार मिल जाएगा.
इसी वजह से भविष्य में एमडीआर लागू होने की आशंकाएं जताई जा रही हैं.
