October 24, 2026

पंजाब: ‘बात सुनने’ से ज्यादा बीजेपी के लिए ‘भरोसा कायम करना’ बनी असली चुनौती; जानें सियासी मायने

मुझे कभी इतना दुख नहीं हुआ।” पंजाब में नशे की समस्या से बर्बाद हुए तीन परिवारों से मिलने के बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के कहे इन शब्दों ने शायद ग्रामीण पंजाब में लोगों के दिलों को छू लिया है। एक ऐसा इलाका जहां भारतीय जनता पार्टी की पैठ हमेशा मुश्किल रही है।

लंबे समय से बीजेपी राज्य में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रही है, खासकर बुद्धिजीवियों के बीच यह पक्का विश्वास है कि बॉर्डर वाले राज्य के पुराने बागी मूड को देखते हुए उसे कभी एक इंच भी फायदा नहीं होगा। जब शाह ने पार्टी के नशा मुक्त मार्च के आखिर में एक फीकी रैली की अध्यक्षता की, तो विपक्ष में खुशी की लहर दौड़ गई।

अगले 20 दिनों तक यही बात कही जाती रही कि इससे पता चला कि पार्टी जनता के बीच कितनी कम असरदार है। फिर शाह फिर आए, इस बार दशहरे पर और उस दिन मार्च निकाल लिया जिस दिन अच्छाई बुराई को हराती है।

बीजेपी ने ड्रग्स को अपना मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया है, यह तो सब देख सकते हैं। लेकिन क्या इससे लोगों की भावनाएं भड़क सकती हैं, जब यह बुराई आम हो गई है? राज्य ने ड्रग्स को खत्म करने के लिए इतने सारे अभियान और वादे देखे हैं कि अब किसी नए पर यकीन करना मुश्किल है।

आम आदमी पार्टी सरकार और विपक्षी कांग्रेस और कुछ हद तक शिरोमणि अकाली दल बीजेपी की बातों का जवाब देने के मामले में एक ही आवाज में बोलते हैं। मुख्यमंत्री भगवंत मान और पंजाब कांग्रेस के नए चीफ परगट सिंह दोनों एक ही बात पर दो सवाल पूछते हैं, बीजेपी बॉर्डर पार से ड्रग्स को आने से क्यों नहीं रोक पाई है, जिसे केंद्र के कंट्रोल वाली बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स चलाती है? और वह उन्हें कांडला पोर्ट पर आने और वहां से बांटे जाने से क्यों नहीं रोक पाई है?

जैसे-जैसे बीजेपी राज्य की राजनीति के केंद्र में आ रही है, पंजाब में उसके गेम प्लान को लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। क्या बीजेपी कोई लंबी रणनीति अपना रही है, जिसमें 2027 के विधानसभा चुनावों में अपना वोट शेयर और सीटों की संख्या बढ़ाकर ग्रामीण पंजाब में पैठ बनाना और फिर उसी के सहारे 2032 में जीत की राह तैयार करना शामिल हो? या फिर क्या यह ताकत या सही तरीके से जीत हासिल करने की कोशिश करेगी? क्या यह खुद को सत्ता में लाने के लिए बड़ी संख्या में विधायकों को अपने साथ मिला लेगी? एक तीसरा नजरिया भी है, क्या यह पंजाब को लुभाने के लिए कुछ ऐसा करेगी जो पहले कभी नहीं हुआ?

यह आखिरी वाला नजरिया उन लोगों को बहुत पसंद है जो हमेशा चीजों के सकारात्मक पहलू को देखते हैं। दबी जुबान में इस बात की चर्चा हो रही है कि पंजाब जैसे जिद्दी राज्य को साधने के लिए पार्टी अपनी झोली से कौन सा ‘जादुई दांव’ निकाल सकती है। खेती-किसानी से जुड़े लोगों का सुझाव है कि पार्टी किसानों के कर्ज का बोझ कम करने का वादा कर सकती है।

लेकिन व्यावहारिक सोच रखने वालों का मानना ​​है कि जब तक पार्टी कोई ठोस कदम नहीं उठाती, तब तक किसी वादे का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि किसान आंदोलन के समय से ही लोगों के मन में पार्टी के प्रति गहरा अविश्वास बना हुआ है। एक और कयास यह भी है कि पार्टी चंडीगढ़ को पंजाब को सौंपने की घोषणा कर सकती है। हालांकि, इसके जवाब में यह भी कहा जा रहा है कि ऐसा करने पर पार्टी चंडीगढ़ और शायद हरियाणा, दोनों को ही गंवा सकती है।

ऐसे माहौल में शाह का दिन भर का यह दौरा काफी अहम हो जाता है, खासकर तब जब वे उत्तर प्रदेश के चुनावों और दिल्ली में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ से निपटने में पूरी तरह व्यस्त हैं।

ऐसा नहीं है कि बीजेपी पंजाब को गंभीरता से नहीं ले रही है। 2020 में अकालियों से अलग होने के तुरंत बाद उसने ऐसा करना शुरू कर दिया था, जब वह देहात में अलग-थलग पड़ गई थी। पार्टी ने 2022 में कांग्रेस के बाहर होने का तुरंत फायदा उठाया और उसके कई पुराने नेताओं को अपने साथ ले लिया।

वे न सिर्फ बीजेपी कैंप में ज्यादा पगड़ी लाए, जिससे उसका आधार और बड़ा हुआ, बल्कि उनका वोटर बेस भी बढ़ा, हालांकि कुछ मामलों में यह कम हो गया था। इसके बाद, पार्टी ने 2024 के लोकसभा चुनावों में अपना वोट शेयर बढ़ाकर 19% कर लिया, जो पंजाब में उसका अब तक का सबसे ज़्यादा वोट शेयर था, हालांकि वह एक भी सीट नहीं जीत पाई।

फिर पार्टी का पंजाबीकरण शुरू हुआ, जो उन दिनों से बहुत अलग था जब इसके कुछ नेता हिंदी के लिए कैंपेन चलाते थे। सिखों तक पहुंच भी ज्यादा साफ दिख रही थी। केंद्र ने गुरु गोबिंद सिंह के छोटे बेटों, साहिबजादा जोरावर सिंह और साहिबजादा फतेह सिंह को सम्मान देने के लिए वीर बल दिवस शुरू किया, जो अपना धर्म छोड़ने से मना करने पर शहीद हो गए थे। गुरु तेग बहादुर को भी न सिर्फ पंजाब में बल्कि दिल्ली में भी ज्यादा पहचान के साथ याद किया जा रहा है।

यह कहना गलत नहीं होगा कि पंजाब में नशीले पदार्थों का सेवन एक आम बात हो गई है। जब हम किसी बहुत बुरी चीज के साथ लंबे समय तक रहते हैं, तो वह भी सामान्य लगने लगती है। मानसिक संतुलन बनाए रखने का यह हमारा एक स्वाभाविक तरीका है। लेकिन पंजाब में ‘चिट्टा’ (हेरोइन) और अन्य फार्मा दवाओं के कारण हो रहे नुकसान पर भाजपा का विशेष ध्यान, शायद उन लोगों को भी झकझोर दे जो अब इन चीज़ों के आदी या बेअसर हो चुके हैं।

परविंदर सिंह झोटा की हत्या कर दी गई। उनके पीछे अब उनका परिवार है। झोटा के पिता भीम सिंह ने शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी द्वारा उनके दो छोटे पोतों के लिए एफडी कराने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। उन्होंने कहा कि परिवार को दान नहीं, बल्कि न्याय चाहिए। उनकी पत्नी मनप्रीत कौर और उनके दो छोटे बेटे अब एक ऐसे गहरे दुख से जूझ रहे हैं, जिससे पंजाब अब और मुंह नहीं मोड़ सकता। वे शायद वह कर सकते हैं जो झोटा अपनी जिंदगी में नहीं कर सका, राज्य को ड्रग्स की वजह से हुई सुन्नता से बाहर निकालना।

भीम सिंह एक ऐसे दुख से गुजर रहे हैं जिसका सामना किसी भी पिता को नहीं करना पड़ना चाहिए। फिर भी, मीडिया की लगातार चकाचौंध के बीच भी, वे हमेशा ऐसी बातें कहते हैं जो लोगों को जोड़ने का काम करती हैं। जब पत्रकारों की एक फौज उनसे यह कहलवाने के लिए बेताब होकर उनके इर्द-गिर्द जमा हो गई कि “मैं शाह का बहिष्कार करूंगा”, तो उन्होंने एक सैनिक की सीधी-सादी और व्यावहारिक सोच के साथ उन्हें जवाब दिया। उन्होंने कहा, “मैंने सीमा पर देश की सेवा की है; वे हमारे गृह मंत्री हैं। उनका मेरे घर में स्वागत है।”

बाद में, जब शाह वहां से जा रहे थे, तो भीम सिंह ने उन्हें सैल्यूट किया। एक अनुशासित सैनिक का यह एक सहज कदम था। पंजाब में, भाजपा के सामने चुनौती सिर्फ खुद को दिखाना या अपनी बात सुनाना नहीं है, बल्कि लोगों का भरोसा जीतना है।’राष्ट्रीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका और गठबंधन के बदलते समीकरणों के बीच भाजपा की रणनीति के लिए पंजाब अहम राज्य बन गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के दौरों को केवल संगठन विस्तार की कवायद मानना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी, स्वतंत्र जनाधार बढ़ाने और क्षेत्रीय दलों के साथ राजनीतिक रिश्तों को नए सिरे से तय करने की चुनौती भी है। पंजाब में भाजपा की रणनीति राष्ट्रीय स्तर पर उसकी गठबंधन नीति की दिशा के संकेत दे सकती है।

0Shares

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Copyright © All rights reserved. | Newsphere by AF themes.