ईरान के साथ जारी सैन्य संघर्ष के बीच अमेरिका और यूरोप में हजारों लोगों ने सड़कों पर उतरकर ‘No Kings’ नाम से बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए। ये प्रदर्शन डोनाल्ड की नीतियों खासकर ईरान के साथ चल रहे युद्ध और उनकी आक्रामक राजनीतिक शैली के खिलाफ आयोजित किए गए। इन रैलियों ने न केवल अमेरिका बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक ध्यान आकर्षित किया है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि ट्रंप के फैसलों ने मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ा दिया है, जिससे वैश्विक ऊर्जा कीमतों में उछाल आया है और दुनिया भर में आर्थिक अनिश्चितता बढ़ी है। कई अर्थशास्त्रियों ने आशंका जताई है कि इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था में धीमी वृद्धि, महंगाई में तेजी और यहां तक कि स्टैगफ्लेशन जैसी स्थिति पैदा हो सकती है।
इन विरोध प्रदर्शनों का केंद्र अमेरिका का मिनेसोटा राज्य रहा, जहां हजारों लोग एकजुट होकर ट्रंप की इमिग्रेशन नीति के खिलाफ खड़े नजर आए। लोगों ने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के रूप में पेश किया और सरकार की नीतियों को चुनौती दी।
‘No Kings’ रैलियों के आयोजकों के अनुसार, इससे पहले जून और अक्टूबर में हुए प्रदर्शनों में क्रमशः 50 लाख और 70 लाख लोग शामिल हुए थे। इस बार करीब 90 लाख लोगों के शामिल होने की उम्मीद जताई गई थी, हालांकि वास्तविक आंकड़े अभी स्पष्ट नहीं हैं। इन प्रदर्शनों में आव्रजन नीति, ट्रांसजेंडर अधिकारों में कटौती और ईरान युद्ध जैसे मुद्दे प्रमुख रहे।
इस बीच, मशहूर अमेरिकी गायक ब्रूस स्प्रिंग्सटीन मिनेसोटा के सेंट पॉल में आयोजित मुख्य कार्यक्रम का आकर्षण बने। उन्होंने अपने गीत “Streets of Minneapolis” के जरिए पुलिस कार्रवाई और हिंसा के खिलाफ आवाज उठाई। यह गीत संघीय एजेंटों द्वारा दो लोगों की मौत के बाद लिखा गया था। स्प्रिंगस्टीन ने मंच से लोगों के विरोध को उम्मीद की किरण बताया।
देश के अन्य हिस्सों में भी बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। सैन डियागो में लगभग 40,000 लोगों ने मार्च किया, जबकि वाशिंगटन डीसी में सैकड़ों लोग लिंकन स्मारक से लेकर नेशनल मॉल तक रैली निकालते दिखे। प्रदर्शनकारियों के हाथों में “Put down the crown” और “Regime change begins at home” जैसे नारे लिखे पोस्टर थे।
लॉस एंजिल्स में स्थिति कुछ तनावपूर्ण हो गई, जहां पुलिस ने एक संघीय डिटेंशन सेंटर के पास आंसू गैस का इस्तेमाल किया और कुछ लोगों को गिरफ्तार भी किया। वहीं न्यूयॉर्क सिटी में नागरिक अधिकार संगठनों ने सरकार पर लोगों को डराने का आरोप लगाया। इन प्रदर्शनों की गूंज यूरोप में भी सुनाई दी। रोम, लंदन और पेरिस सहित कई शहरों में लोगों ने मार्च निकालकर ट्रंप की नीतियों और ईरान युद्ध का विरोध किया। रोम में प्रदर्शनकारियों ने इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के खिलाफ भी नारे लगाए, जबकि लंदन में “Stop the far right” जैसे संदेश देखने को मिले।
वाइट हाउस ने इन प्रदर्शनों को खारिज करते हुए कहा कि ये वामपंथी संगठनों द्वारा प्रायोजित हैं और आम जनता का इनसे ज्यादा संबंध नहीं है। रिपब्लिकन पार्टी के नेताओं ने भी इन रैलियों की आलोचना करते हुए इन्हें अमेरिका विरोधी करार दिया।